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ग़ज़ल
रहा करते हैं क़ैद-ए-होश में ऐ वाए-नाकामी
वो दश्त-ए-ख़ुद-फ़रामोशी के चक्कर याद आते हैं
हसरत मोहानी
नज़्म
बंजारा-नामा
क्या बधिया भैंसा बैल शुतुर क्या गौनें पल्ला सर-भारा
क्या गेहूँ चाँवल मोठ मटर क्या आग धुआँ और अँगारा
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
दर्द-ए-दिल लिखूँ कब तक जाऊँ उन को दिखला दूँ
उँगलियाँ फ़िगार अपनी ख़ामा ख़ूँ-चकाँ अपना
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
ख़्वाब जो बिखर गए
ये तल्ख़ तल्ख़ राहतें, जराहतें लिए हुए
ये ख़ूँ-चकाँ लताफ़तें कसाफ़तें लिए हुए
आमिर उस्मानी
नज़्म
रातें सच्ची हैं दिन झूटे हैं
वो सब इक बर्फ़ानी भाप की चमकीली और चक्कर खाती गोलाई थे
सो मेरे ख़्वाबों की रातें जलती और दहकती रातें
जौन एलिया
ग़ज़ल
इन्हीं साँसों के चक्कर ने हमें वो दिन दिखाए थे
हमारे पाँव की मिट्टी हमारे सर पे रक्खी थी


