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ग़ज़ल
हक़ीक़त में मैं बुलबुल हूँ मगर चारे की ख़्वाहिश में
बना हूँ मेम्बर-ए-कौंसिल यहाँ मिठ्ठू मियाँ हो कर
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
बे-ज़बाँ उर्दू
दिया पैग़ाम उस ने एकता का भाई-चारे का
रही दीवार बन कर नफ़रतों के दरमियाँ उर्दू
रहबर जौनपूरी
ग़ज़ल
शराब पी चुके बे-चारे को इजाज़त दो
खड़ा है देर से रुख़्सत को ऐ निगार लिहाज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
बा'द-ए-फ़िराक़ रंग-ए-वस्ल होता है 'ऐन इम्बिसात
मेरा वो राहत-ए-रवाँ दिल से हुआ दो-चार-ए-शब
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
हास्य
लगी कुछ हूँस ऐसी शैख़ बे-चारे की सेह्हत पर
कि अब तो आए दिन डोली दवा-ख़ाने में रक्खी है
माचिस लखनवी
ग़ज़ल
दुआओं का असर माँ के लबों से फूट पड़ता है
मैं जब बे-चारा होता हूँ कई चारे निकलते हैं
वसीम फ़रहत अलीग
ग़ज़ल
दुआ दिल से निकलती है तो चाँदी डाल देता है
ख़ुदा चाहे तो हर सीपी में मोती डाल देता है


