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नज़्म
ऑनलाइन आशिक़
इश्क़ कहते हैं जिसे इक नया समझौता है
पहले दिल मिलते थे अब नाम क्लिक होता है
खालिद इरफ़ान
नज़्म
नक़्क़ाद
कैफ़ में इक ''लग़्ज़िश-ए-पा'' किल्क-ए-गौहर-बार की
''इज़्तिरारी एक जुम्बिश सी'' लब-ए-गुफ़्तार की
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
तुम तो करते हो मिरी क्लिक-ए-सुख़न को पाबंद
कौन है कातिब-ए-तक़दीर-ए-वतन क्या जानो?
परवेज़ शाहिदी
ग़ज़ल
क्यूँ कर न होवे क्लिक हमारा गुहर-फ़िशाँ
करते हैं 'आबरू' ये तख़ल्लुस सुख़न में हम
आबरू शाह मुबारक
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ग़ज़ल
अहल-ए-सुख़न का या-रब क्यूँ मोहतसिब है दुश्मन
क्लिक ओ दवात है कुछ जाम-ओ-सुबू नहीं याँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
ज़ाहिद के क़द्द-ए-ख़म कूँ मुसव्विर ने जब लिखा
तब क्लिक हाथ बीच जो था सो असा हुआ
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
ख़िज़्र-सुल्ताँ को रखे ख़ालिक़-ए-अकबर सरसब्ज़
शाह के बाग़ में ये ताज़ा निहाल अच्छा है
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
फ़रमान-ए-ख़ुदा
क्यूँ ख़ालिक़ ओ मख़्लूक़ में हाइल रहें पर्दे
पीरान-ए-कलीसा को कलीसा से उठा दो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आदमी-नामा
हत्ता कि अपने ज़ोहद-ओ-रियाज़त के ज़ोर से
ख़ालिक़ से जा मिला है सो है वो भी आदमी
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
मा'रिफ़त ख़ालिक़ की आलम में बहुत दुश्वार है
शहर-ए-तन में जब कि ख़ुद अपना पता मिलता नहीं
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
मुफ़्लिसी
दुनिया में ले के शाह से ऐ यार ता-फ़क़ीर
ख़ालिक़ न मुफ़्लिसी में किसी को करे असीर










