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ग़ज़ल
अनवर मिर्ज़ापुरी
ग़ज़ल
उठा है शोर ख़ुद अपने ही अंदर से मगर अक्सर
दहल के बंद कर लेना पड़ी हैं खिड़कियाँ हम को
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
नज़्म
शाम-ए-अयादत
ये किन निगाहों ने मिरे गले में बाहें डाल दीं
जहान भर के दुख से दर्द से अमाँ लिए हुए
फ़िराक़ गोरखपुरी
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शेर
शोख़ी-ए-हुस्न के नज़्ज़ारे की ताक़त है कहाँ
तिफ़्ल-ए-नादाँ हूँ मैं बिजली से दहल जाता हूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
चार चुप चीज़ें हैं बहर-ओ-बर फ़लक और कोहसार
दिल दहल जाता है इन ख़ाली जगहों के सामने
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
तुलसीदास
दिल दहल जाता है जिस भी वक़्त करते हैं ख़याल
तेरी रामायण न होती गर तो होता कैसा हाल
जगत मोहन लाल रवाँ
ग़ज़ल
मैं ने ये जब सुना तो मिरा दिल दहल गया
सूरज का जिस्म आग की लपटों से जल गया






