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नज़्म
नूर-जहाँ का मज़ार
आरास्ता जिन के लिए गुलज़ार ओ चमन थे
जो नाज़ुकी में दाग़ दह-ए-बर्ग-ए-समन थे
तिलोकचंद महरूम
ग़ज़ल
खड़े चुप हो देखते क्या मिरे दिल उजड़ गए को
वो गुनह तो कह दो जिस से ये दह-ए-ख़राब उल्टा
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
नज़्म
महात्मा-गाँधी
लगन उसे है कि सब मालिक-ए-वतन हो जाएँ
क़फ़स से छूट के ज़ीनत-दह-ए-चमन हो जाएँ
बिस्मिल इलाहाबादी
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ग़ज़ल
हैं कहाँ आह वो हूरान-ए-तसव्वुर जिन से
दिल था ग़ैरत-दह-ए-गुलज़ार-ए-जिनाँ आज की रात
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
नज़्म
गुल
वादियों में तू, बयाबानों में तू, बस्ती में तू
रौनक़-ए-हर-महफ़िल ओ ज़ीनत-दह-ए-हर-अंजुमन


