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नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
और ख़ाकिस्तर से आप अपना जहाँ पैदा करे
ज़िंदगी की क़ूव्वत-ए-पिन्हाँ को कर दे आश्कार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हिण्डोला
कि जैसे हाथ अबद रख दे दोश-ए-तिफ़्ली पर
हर एक लम्हा के रख़नों से झाँकती सदियाँ
फ़िराक़ गोरखपुरी
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नज़्म
कौन सी उलझन को सुलझाते हैं हम?
शाम को जब अपनी ग़म-गाहों से दुज़्दाना निकल आते हैं हम?
या ज़वाल-ए-उम्र का देव-ए-सुबुक-पा रू-ब-रू
नून मीम राशिद
नज़्म
परछाइयाँ
सियाहियों का दबे-पाँव आसमाँ से नुज़ूल
लटों को खोल दे जिस तरह शाम की देवी
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
सानेहा
देव-ए-बदी से मार्का-ए-सख़्त ही सही
ये तो नहीं कि ज़ोर-ए-जवानाँ चला गया
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अँधेरी रात का मुसाफ़िर
जहाँ तक देख सकता हूँ अँधेरा ही अँधेरा है
मगर मैं अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ता ही जाता हूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
सुर्ख़ सितारा
देव-ए-ज़ुल्मात की ठोकर से न पाएँगे पनाह
ये शिवाले, ये मसाजिद, ये पुजारी, ये सनम











