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pher
फेर پھیر
ऐसी स्थिति जिसमें किसी को अथवा किसी के चारों ओर फिरना पड़ता है। घुमाव। चक्कर। क्रि० प्र०-पड़ना। पद-फेर की बात घुमाव की बात। ऐसी बात जो सीधी या सरल न हो, बल्कि जिसमें घुमाव-फिराव, पेच या चालाकी भरी हो। मुहा०-फेर खाना = सीधे रास्ते से न जाकर घुमाव-फिराववाले रास्ते से जाना।
phuuT
फूट پُھوٹ
जिन लोगों को आपस में मिलकर रहना या जो आपस में मिलकर रहते आये हों, उनमें उत्पन्न होनेवाला पारस्परिक विरोध या वैमनस्य। आपसी अनबन या बिगाड़। पद-फूट-फटक-आपस में होनेवाली अनबन या फूट। मुहा०-फूट डालना = जो लोग मिलकर रहते हों उनमें भेद-भाव या विरोध उत्पन्न करना।
peT
पेट پیٹ
उक्त अंग के भीतरी भाग की वह थैली जिसमें पहुँचकर खाया हुआ भोजन पचता है, आमाशय, ओझर, पचौनी, विशेष-पेट में होनेवाले विकारों तथा उसकी आवश्यकताओं से संबंधित पद और मुहावरे इसी अर्थ के अंतर्गत आये हैं, पद-पेट का कुता जो केवल भोजन के लालच से सब कुछ करता या कर सकता हो, केवल पेट के लिए सब कुछ करनेवाला, पेट का धंधा , रसोई बनाने का काम या व्यवस्था, जैसे-स्त्रियाँ सबेरे उठते ही पेट के धंधे में लग जाती हैं, जीविका-निर्वाह के लिए किया जानेवाला उद्योग, काम-धंधा, पेट को आग भख, क्षुधा, पेट के लिए इस उद्देश्य से कि पेट भरने का साधन बना रहे, उदर पूर्ति या जीविका-निर्वाह के लिए, मुहा०-पेट अफरना पेट में ऐसा विकार होना कि वह वायु से भर और फूल जाय, पेट आना-पतले दस्त आना, (वव०) पेट और पीठ एक हो जाना या पेट पीठ से लग जाना बहुत भूख लगना, बहुत अधिक दुबला हो जाना, (अपना) पेट काटना पैसे बचाने के लिए कम खाना, इसलिए कम खाना कि पैसों की कुछ बचत हो, (किसी का) पेट काटना ऐसा काम करना जिससे किसी को खाने के लिए आवश्यक या उचित से कम अन्न या धन मिले, जैसे- गरीब का पेट नहीं काटना चाहिए, पेट का पानी तक न हिलना कुछ भी कष्ट या परिश्रम न पड़ना, जरा भी तकलीफ या मेहनत न होना, पेट का पानी न पचना किसी काम या बात के लिए इतनी उत्सुकता और विकलता होना कि उसके बिना रहा न जा सके, पेट को आग बुझाना पेट में भोजन पहुँचाना, खाकर भूख मिटाना, (किसी को) पेट को मार देना (या मारना), भूखा रखना, भोजन न देना
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ग़ज़ल
याद के फेर में आ कर दिल पर ऐसी कारी चोट लगी
दुख में सुख है सुख में दुख है भेद ये न्यारा भूल गया
मीराजी
ग़ज़ल
शिद्दत-ए-तिश्नगी में भी ग़ैरत-ए-मय-कशी रही
उस ने जो फेर ली नज़र मैं ने भी जाम रख दिया
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
तुम्हें चाहूँ तुम्हारे चाहने वालों को भी चाहूँ
मिरा दिल फेर दो मुझ से ये झगड़ा हो नहीं सकता







