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नज़्म
एक शाएरा की शादी पर
हाँ वो औरत जिसे बच्चों का फ़साना कहिए
बरबत-ए-नफ़्स का इक फ़ुहश तराना कहिए
अख़्तर शीरानी
नज़्म
शरीफ़-ज़ादा
बहुत फ़ुहश और मुब्तज़िल नाच था वो
कि जिस के रेकॉर्डों की घटिया धुनों पर
ज़ुबैर रिज़वी
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नज़्म
बंजारा-नामा
घर-बार अटारी चौपारी क्या ख़ासा नैन-सुख और मलमल
चलवन पर्दे फ़र्श नए क्या लाल पलंग और रंग-महल
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
हज़रत-ए-नासेह गर आवें दीदा ओ दिल फ़र्श-ए-राह
कोई मुझ को ये तो समझा दो कि समझावेंगे क्या
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
तू ने ये क्या ग़ज़ब किया मुझ को भी फ़ाश कर दिया
मैं ही तो एक राज़ था सीना-ए-काएनात में
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
मिट नहीं सकता कभी मर्द-ए-मुसलमाँ कि है
उस की अज़ानों से फ़ाश सिर्र-ए-कलीम-ओ-ख़लील
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
समुंदर का बुलावा
गिरते हैं इक फ़र्श-ए-मख़मल बनाते हैं जिस पर
मिरी आरज़ूओं की परियाँ अजब आन से यूँ रवाँ हैं
मीराजी
ग़ज़ल
बहुत मुद्दत के नख़चीरों का अंदाज़-ए-निगह बदला
कि मैं ने फ़ाश कर डाला तरीक़ा शाहबाज़ी का
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
एक ख़्वाब
फ़र्श पर लेट गई है तू कभी रूठ के मुझ से
और कभी फ़र्श से मुझ को भी उठाया है मना कर

