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नज़्म
कौन है मुजरिम शहर-ए-इल्म की ताराजी का
कम-ज़र्फ़ और हक़ीर हैं ये
ये दानाओं के हक़ को यकसर ग़बी को मोहमल को बेचते हैं
अबु बक्र अब्बाद
ग़ज़ल
कहता नहीं सुनता नहीं हँसता नहीं रोता नहीं
मैं भी अज़ल से आज तक कैसे ग़बी के साथ हूँ
ग़ुलाम हुसैन साजिद
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नज़्म
अपने आप से
हर ग़बी कुंद-ज़ेहन शख़्स की ख़िदमत में झुकाना हँसना
मुस्कुराते हुए कहना साहब
ज़ाहिद डार
नज़्म
इस धरती के तारे हम हैं
ये मा'ज़ूर बेकस ग़बी ज़ेहनी बच्चे
हैं इंसाँ नहीं कोई माटी के पुतले
बिस्मिल्लाह अदीम
नज़्म
आख़री 'इलाज
दिमाग़ को करेगा ला-मकान भी
मिरा तबीब कम पढ़ा ग़बी भी है उसे ख़बर नहीं ज़रा











