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नज़्म
दो इश्क़
आँखों से लगाया है कभी दस्त-ए-सबा को
डाली हैं कभी गर्दन-ए-महताब में बाहें
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
वालिदा मरहूमा की याद में
है लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंद
डालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तीन आवाज़ें
दिन ढला ख़ौफ़ का इफ़रीत मुक़ाबिल आया
या ख़ुदा ये मिरी गर्दान-ए-शब-ओ-रोज़-ओ-सहर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
कलीम आजिज़
ग़ज़ल
हर इशारे पर है फिर भी गर्दन-ए-तस्लीम ख़म
जानता हूँ साफ़ धोके दे रहा है दिल मुझे
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
इक गर्दन-ए-मख़्लूक़ जो हर हाल में ख़म है
इक बाज़ू-ए-क़ातिल है कि ख़ूँ-रेज़ बहुत है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
वतन
तेरी ही गर्दन-ए-रंगीं में हैं बाँहें अपनी
तेरे ही इश्क़ में हैं सुब्ह की आहें अपनी
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
ये कहाँ से आई है सुर्ख़-रू है हर एक झोंका लहू लहू
कटी जिस में गर्दन-ए-आरज़ू ये उसी चमन की हवा है क्या
कलीम आजिज़
ग़ज़ल
सैर-ए-मुल्क-ए-हुस्न कर मय-ख़ाना-हा नज़्र-ए-ख़ुमार
चश्म-ए-मस्त-ए-यार से है गर्दन-ए-मीना पे बाज



