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नज़्म
रक़ीब से!
जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाह-राहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
अबुल-अला-म'अर्री
कहते हैं कभी गोश्त न खाता था म'अर्री
फल-फूल पे करता था हमेशा गुज़र-औक़ात
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
रिश्वत
आप को मालूम भी है चल रही है क्या हवा
सिर्फ़ इक टाई की क़ीमत घोंट देती है गला
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
देखो तो पेट बन गया आख़िर ग़ुबारा गैस का
खाते हो इतना गोश्त क्यों पीते हो इतनी चाय क्यों
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं
बोला बीबी इस बिल्ली का कुछ तो करें उपाए
दूध न छोड़े गोश्त न छोड़े हैं बुढ्ढा लाचार
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
अपाहिज गाड़ी का आदमी
कुछ ऐसे हैं जो ज़िंदगी को मह-ओ-साल से नापते हैं
गोश्त से साग से दाल से नापते हैं
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
उबाल
उबलने लगीं सब्ज़ियाँ फूल फल गोश्त दालें अनाज
अभी शोरबे के खदकने की आवाज़ छाई हुई थी
अमीक़ हनफ़ी
नज़्म
ईद की ख़रीदारी
मियाँ बीवी चले बाज़ार को बहर-ए-ख़रीदारी
मिठाई फल सिवय्याँ इत्र जूते गोश्त तरकारी
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
हास्य
क़साई बकरे का गोश्त ले कर सभी हिमाला पे जा चढ़ेंगे
जो उन का पीछा करेगा घिस-पिस के एक मुश्त ग़ुबार होगा

