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नज़्म
ख़्वाब जो बिखर गए
मगन था मैं कि प्यार के बहुत से गीत गाऊँगा
ज़बान गुंग हो गई, गले में गीत घुट गए
आमिर उस्मानी
ग़ज़ल
दबी हुई है ज़ेर-ए-ज़मीं इक दहशत गुंग सदाओं की
बिजली सी कहीं लरज़ रही है किसी छुपे तह-ख़ाने में
मुनीर नियाज़ी
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ग़ज़ल
सोचती हूँ क्यूँ मैं जैसे गुंग हो कर रह गई
इस तरह सीने में दिल पहले कभी धड़का न था
फ़र्ख़न्दा रज़वी
नज़्म
फ़ता-कल्लमू तअ'रफू
न जाने कैसे मेरी जीभ गुंग थी
मैं सुम्मुन बुक्मुम था, बे-ज़बान, दम-ब-ख़ुद





