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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
थी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्या
अर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्या
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
चंद नसीहतें
साथ वाले देखना तुम से न बढ़ जाएँ कहीं
जोश ऐसा चाहिए ऐसी हमिय्यत चाहिए
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
ज़रा ऐ कुंज-ए-मरक़द याद रखना उस हमिय्यत को
कि घर वीरान कर के हम तुझे आबाद करते हैं
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
मुझे जाना है इक दिन
अभी तो काएनात औहाम का इक कार-ख़ाना है
अभी धोका हक़ीक़त है हक़ीक़त इक फ़साना है
असरार-उल-हक़ मजाज़
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नज़्म
सरमाया-दारी
कहीं ये ख़ूँ से फ़र्द-ए-माल-ओ-ज़र तहरीर करती है
कहीं ये हड्डियाँ चुन कर महल ता'मीर करती है
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
'ज़हीर'-ए-ख़स्ता-जाँ शब सो रहा कुछ खा के सुनते हैं
तअ'ज्जुब क्या है इंसाँ को हमिय्यत आ ही जाती है
ज़हीर देहलवी
नज़्म
ख़ाना-ब-दोश
पैसा अगर मिले तो हमीयत भी बेच दें
रोटी का आसरा हो तो इज़्ज़त भी बेच दें
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
शिकस्त-ए-ज़िंदाँ
शिकस्त-ए-मजलिस-ओ-ज़िन्दाँ का वक़्त आ पहुँचा
वो तेरे ख़्वाब हक़ीक़त में ढाल आए हैं


