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नज़्म
बुलंदी और पस्ती
ज़रा पस्ती-ए-क़ौम-ओ-मिल्लत को देखो
और इस की ज़रा ज़ार हालत को देखो
निसार कुबरा अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
मैं पस्ती-ए-अख़्लाक़-ए-बशर देख रहा हूँ
फिर नज़्म-ए-जहाँ ज़ेर-ओ-ज़बर देख रहा हूँ
अब्दुल मजीद मंज़र मुर्तज़ापुरी
ग़ज़ल
आसमाँ की खोज में हम से ज़मीं भी खो गई
कितनी पस्ती में मज़ाक़-ए-बाल-ओ-पर ले जाएगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
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ग़ज़ल
ज़ख़्म मिलते हैं इलाज-ए-ज़ख़्म-ए-दिल मिलता नहीं
वज़-ए-क़ातिल रह गई रस्म-ए-मसीहाई गई
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
दुआ
दिल-ए-मुर्दा को हो वो जज़्बा-ए-बेताब अता
मरज़-ए-पस्ती-ए-मिल्लत का जो दरमाँ कर दे
ज़फ़र अहमद सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
इलाज-ए-ज़ख़्म-ए-दिल होता है ग़म-ख़्वारी भी होती है
मगर मक़्तल की मेरे ख़ूँ से गुल-कारी भी होती है




