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ग़ज़ल
इल्तिबास आप को जब से है वफ़ाओं पे मिरी
दिल ग़रीक़-ए-ग़म-ओ-हिरमाँ है ख़ुदा ख़ैर करे
अज़ीम हैदराबादी
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विषय
ऐतबार
ऐतबार शायरी
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ग़ज़ल
शोहरत नज़र में हो तो बलाग़त से क्या ग़रज़
सरक़े का ग़म नहीं तो ग़म-ए-इल्तिबास क्या
सरफ़राज़ ख़ान आज़मी
नज़्म
सफ़र नदिया के पानी को वदीअ'त है
वो बस इक इल्तिबास-ए-वक़्त था
अब तो मिरे पानी में गदलाहट है
परवीन ताहिर
ग़ज़ल
अजब ए'तिबार ओ बे-ए'तिबारी के दरमियान है ज़िंदगी
मैं क़रीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है








