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ग़ज़ल
इक़्लीम-ए-मआनी में 'अमल हो गया मेरा
दुनिया में भरोसा था किसे ताज-ओ-नगीं का
वाजिद अली शाह अख़्तर
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ग़ज़ल
नहीं इक़लीम-ए-उल्फ़त में कोई तूमार-ए-नाज़ ऐसा
कि पुश्त-ए-चश्म से जिस की न होवे मोहर उनवाँ पर
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
भारत के मुसलमान
अफ़राद की तंज़ीम फ़रामोश हुई क्यूँ
ख़ल्लास की अक़्लीम फ़रामोश हुई क्यूँ
जगन्नाथ आज़ाद
नज़्म
इंक़लाब-ए-हिन्द
सब्र वाले छा रहे हैं जब्र की अक़्लीम पर
हो गया फ़र्सूदा शमशीर-ओ-सिनाँ का इंक़लाब
ज़फ़र अली ख़ाँ
नज़्म
प्यार का तोहफ़ा
जो सदा हुस्न की अक़्लीम में मुम्ताज़ रहे
दिल के आईने में उतरी है वो तस्वीर अब के
साहिर लुधियानवी
नज़्म
नमरूद की ख़ुदाई
अजम, वो मर्ज़-ए-तिलिस्म-ओ-रंग-ओ-ख़्याल-ओ-नग़मा
अरब, वो इक़लीम-ए-शीर-ओ-शहद-ओ-शराब-ओ-खुर्मा
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
है फ़ौज फ़ौज-ए-ग़म्ज़ा-ओ-अंदाज़ तेरे साथ
अक़्लीम-ए-नाज़ का है तुझे तख़्त-ओ-ताज आज
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
नज़्म
तिफ़्ली के ख़्वाब
क़दमों पे जिन के ताज हैं इक़्लीम-ए-दहर के
उन चंद कुश्तगान-ए-ग़म-ए-दिल में हम भी हों










