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हास्य
अगर ये रेलवे का सिलसिला ईरान जा पहुँचे
तो सिक्खर पर उतरता शख़्स असफ़हान जा पहुँचे
सय्यद ज़मीर जाफ़री
नज़्म
गंगा रो रही थी
कभी मैं इसफ़हाँ और नज्द-ओ-कूफ़े में फिरा
जब मुद्दतों के बा'द वापस लौट कर आया तो
ज़ुबैर रिज़वी
ग़ज़ल
ख़याल-ए-अबरू-ए-क़ातिल किया जो फ़ुर्क़त में
पहुँच गई वहीं शमशीर-ए-इसफ़हाँ सर पर
राजा गिरधारी प्रसाद बाक़ी
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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
यूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी हो
तुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी हो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
दस्त-अफ़्शाँ चलो मस्त ओ रक़्साँ चलो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
यूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी हो
तुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी हो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
कोई 'आशिक़ किसी महबूबा से!
गुलशन-ए-याद में गर आज दम-ए-बाद-ए-सबा
फिर से चाहे कि गुल-अफ़शाँ हो तो हो जाने दो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
किस से मोहब्बत है
लब-ए-लालीं पे लाखा है न रुख़्सारों पे ग़ाज़ा है
जबीं-ए-नूर-अफ़्शाँ पर न झूमर है न टीका है
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
कौन होता है हरीफ़-ए-मय-ए-मर्द-अफ़गन-ए-इश्क़
है मुकर्रर लब-ए-साक़ी पे सला मेरे बा'द
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
याद-ए-अलीगढ़
कभी बज़्म-ए-अहबाब में शोला-अफ़्शाँ
कभी यूनियन में थे शमशीर-ए-बुर्रां






