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नज़्म
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सर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू ने
इक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू ने
अल्लामा इक़बाल
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ग़ज़ल
कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम
उस निगाह-ए-आश्ना को क्या समझ बैठे थे हम
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
रूह-ए-अर्ज़ी आदम का इस्तिक़बाल करती है
खोल आँख ज़मीं देख फ़लक देख फ़ज़ा देख!
मशरिक़ से उभरते हुए सूरज को ज़रा देख!
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
पुर्सिश-ए-तर्ज़-ए-दिलबरी कीजिए क्या कि बिन कहे
उस के हर एक इशारे से निकले है ये अदा कि यूँ











