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नज़्म
एक पहाड़ और गिलहरी
जो बात मुझ में है तुझ को वो है नसीब कहाँ
भला पहाड़ कहाँ जानवर ग़रीब कहाँ!
अल्लामा इक़बाल
उद्धरण
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
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jaavnaa
जावना جاوْنا
رک : جانا .
jhankaar
झंकार جَھنْکار
प्रतिध्वनि, गूँज, भुनभुनाहट, अनुनाद, सितार या वीणा आदि की ध्वनि, झन-झन की ध्वनि, झनझनाहट, झंकृति, आभूषणों (नूपुरों आदि) के बजने की मधुर ध्वनि, घुंघरू की आवाज़, काँच टूटने और तलवारें टकराने की आवाज़, कपकपाहट से पैदा होने वाली आवाज़, आवाज़ की थरथराहट, धातु के किसी पात्र पर आघात लगने पर कुछ समय तक उसमें से बराबर निकलता रहनेवाला झनझन शब्द, झनकार, कुछ कीड़ों के बोलने का झन-झन शब्द जैसे झिल्ली या झींगुर की झंकार, मोर की पुकार
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ग़ज़ल
ख़ून से तर-ब-तर कर के हर रहगुज़र थक चुके जानवर
लकड़ियों की तरह फिर से चूल्हे में जल जो हुआ सो हुआ
निदा फ़ाज़ली
ग़ज़ल
तिरी तक़लीद से कब्क-ए-दरी ने ठोकरें खाईं
चला जब जानवर इंसाँ की चाल उस का चलन बिगड़ा
हैदर अली आतिश
नज़्म
मैं अक्सर सर्द रातों में
अचानक जब तुम्हारी याद के वहशी जानवर आवाज़ देते हैं
मैं डरता हूँ
क़मर अब्बास क़मर
उद्धरण
उम्र-ए-तबीई तक तो सिर्फ़ कव्वे, कछुवे, गधे और वो जानवर पहुंचते हैं जिनका खाना शर्अ़न हराम है।...
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
नज़्म
ख़ाना-ब-दोश
अब क्यूँ शरीक-ए-हल्क़ा-ए-नौ-ए-बशर नहीं
इंसान ही तो हैं ये कोई जानवर नहीं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
दरबार1911
आदमी और जानवर और घर मुज़य्यन और मशीन
फूल और सब्ज़ा चमक और रौशनी रेल और तार
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
इंक़लाब-ए-फ़िलिस्तीन
इन मज़ालिम पर भी तू सरशार है मदहोश है
मस्जिदों में जानवर बंधते हैं तू ख़ामोश हैं
शहज़ादी कुलसूम
ग़ज़ल
तुम्हारी बज़्म बात इंसानियत की फिर रक़ीबों में
भरे हैं आदमी की सूरतों के जानवर देखो












