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ग़ज़ल
जगत के लोग सारे 'आबरू' कूँ प्यार करते हैं
अगर तुम भी गले इस कूँ लगाओगे तो क्या होगा
आबरू शाह मुबारक
नज़्म
ये बस्ती मेरी बस्ती है
जगत माँ थी वो
सो छोटा बड़ा हर कोई उस को माय ही कह कर बुलाता था
इशरत आफ़रीं
ग़ज़ल
जगत सबहहा अमत बरहमुख अटक कहसवा ममन करन खा
दिवानी केनी तुमन सुरीजन न सुध की गर पर न बुध की झाला
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
तुम आ गए मेरी बाहोँ में कौनैन की पेंगें झूल गईं
तुम भूल गए, जीने की जगत से रीत गई रुत बीत गई
मजीद अमजद
ग़ज़ल
'रवाँ' किस को ख़बर उनवान-ए-आग़ाज़-ए-जहाँ क्या था
ज़मीं का क्या था नक़्शा और रंग-ए-आसमाँ क्या था






