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ग़ज़ल
जो चराग़ सारे बुझा चुके उन्हें इंतिज़ार कहाँ रहा
ये सुकूँ का दौर-ए-शदीद है कोई बे-क़रार कहाँ रहा
अदा जाफ़री
नज़्म
अपनी मल्का-ए-सुख़न से
चहकी जो तू चमन में हवाएँ महक गईं
गुल-बर्ग-ए-तर से ओस की बूँदें टपक गईं
जोश मलीहाबादी
नज़्म
रिश्वत
भूल कर भी जो कोई लेता है रिश्वत चोर है
आज क़ौमी पागलों में रात दिन ये शोर है
जोश मलीहाबादी
नज़्म
नशात-ए-उमीद
तेरे ही दम से कटे जो दिन थे सख़्त
तेरे ही सदक़े से मिला ताज-ओ-तख़्त
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
मैं नहीं तो क्या
वही शफ़क़ है वही ज़ौ है मैं नहीं तो क्या
मिरे बग़ैर भी तुम कामयाब-ए-इशरत थीं






