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नज़्म
मौज़ू-ए-सुख़न
ये हसीं खेत फटा पड़ता है जौबन जिन का!
किस लिए इन में फ़क़त भूक उगा करती है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
होली
हर गाली, मिस्री, क़ंद-भरी, हर एक क़दम अटखेली का
दिल शाद किया और मोह लिया ये, जौबन पाया होली ने
नज़ीर अकबराबादी
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ग़ज़ल
अजब जौबन है गुल पर आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहारी है
शिताब आ साक़िया गुल-रू कि तेरी यादगारी है
भारतेंदु हरिश्चंद्र
नज़्म
क़ानून-ए-क़ुदरत
फिर गुनगुनाती ज़ुल्मतों का सेहर हर-सू छा गया
बादल कहीं गुम होगए तारों पे जौबन आ गया
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
बाँध गई है मुझ से ऐ दिल बंधन प्रीत की डोरी से
गाँव की वो नार जो अपने जौबन पर इतराती है











