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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
क़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहीं
जज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ताज-महल
अन-गिनत लोगों ने दुनिया में मोहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उन के
साहिर लुधियानवी
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jab
जब جَب
जिस अवस्था में। जिस दशा या हालत में। (इस अर्थ में इसका नित्य संबंधी ' तो ' है)। जैसे जब उन्हें क्रोव चढ़ता है तो उनका चेहरा लाल हो जाता है। पद-जब कभी किसी समय। जब जब जिस जिस समय। जब तब कभी-कभी। जैसे-वहाँ जब-तब हो जाना होता है। जब देखो तब-प्रायः। अक्सर। जैसे-जब देखो तब तुम खेलते ही रहते हो। जब होता है तब अक्सर। प्रायः।
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ग़ज़ल
मन की दुनिया मन की दुनिया सोज़ ओ मस्ती जज़्ब ओ शौक़
तन की दुनिया तन की दुनिया सूद ओ सौदा मक्र ओ फ़न
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
असर है जज़्ब-ए-उल्फ़त में तो खिंच कर आ ही जाएँगे
हमें पर्वा नहीं हम से अगर वो तन के बैठे हैं
दाग़ देहलवी
नज़्म
नज़्र-ए-दिल
जज़्ब है दिल में मिरे दोनों जहाँ का सोज़-ओ-साज़
बरबत-ए-फ़ितरत का हर नग़्मा सुना सकता हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
क्यूँ न जज़्ब हो जाएँ इस हसीं नज़ारे में
रौशनी का झुरमुट है मस्तियों का घेरा है
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
न कर तक़लीद ऐ जिबरील मेरे जज़्ब-ओ-मस्ती की
तन-आसाँ अर्शियों को ज़िक्र ओ तस्बीह ओ तवाफ़ औला
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
जज़्ब-ए-वहशत तिरे क़ुर्बान तिरा क्या कहना
खिंच के रग रग में मिरे नश्तर-ए-फ़स्साद आया
दाग़ देहलवी
नज़्म
हसन कूज़ा-गर (4)
जज़्ब करता रहा था
कि हर आने वाले की आँखों के माबद पे जा कर चढ़ाऊँ
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
लफ़्ज़ों में जज़्ब हो गया सब ज़िंदगी का ज़हर
लहजा बचा है इस को ग़ज़ल की मिठास दे








