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मुईन अहसन जज़्बी

1912 - 2005 | अलीगढ़, भारत

प्रमुखतम प्रगतिशील शायरों में विख्यात/ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के समकालीन/अपनी गज़ल ‘मरने की दुआएँ क्यों माँगूँ.......’ के लिए प्रसिद्ध, जिसे कई गायकों ने स्वर दिए हैं

प्रमुखतम प्रगतिशील शायरों में विख्यात/ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के समकालीन/अपनी गज़ल ‘मरने की दुआएँ क्यों माँगूँ.......’ के लिए प्रसिद्ध, जिसे कई गायकों ने स्वर दिए हैं

ग़ज़ल 34

नज़्म 12

शेर 30

मुख़्तसर ये है हमारी दास्तान-ए-ज़िंदगी

इक सुकून-ए-दिल की ख़ातिर उम्र भर तड़पा किए

मौज-ए-बला उन को भी ज़रा दो चार थपेड़े हल्के से

कुछ लोग अभी तक साहिल से तूफ़ाँ का नज़ारा करते हैं

जो आग लगाई थी तुम ने उस को तो बुझाया अश्कों ने

जो अश्कों ने भड़काई है उस आग को ठंडा कौन करे

ई-पुस्तक 14

Farozan

 

 

Firozan

 

1960

फ़िरोज़ाँ

 

1951

Gudaz-e-Shab

 

1985

हाली का सियासी शऊर

 

1959

Hindustani Adab Ke Memar: Moin Ahsan Jazbi

 

2008

Intikhab-e-Kalam-e-Jazbi

 

1982

Jazbi Ki Shairi Ka Tanqeedi Mutala

 

1993

जज़्बी शनासी

 

2002

Kulliyat-e-Jazbi

 

2007

वीडियो 6

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मरने की दुआएँ क्यूँ माँगूँ जीने की तमन्ना कौन करे

हबीब वली मोहम्मद

मरने की दुआएँ क्यूँ माँगूँ जीने की तमन्ना कौन करे

भारती विश्वनाथन

मौत

अपनी सोई हुई दुनिया को जगा लूँ तो चलूँ

ऑडियो 12

दिल सर्द हो तो वा लब-ए-गुफ़्तार क्या करें

अपनी निगाह-ए-शौक़ को रुस्वा करेंगे हम

जब कभी किसी गुल पर इक ज़रा निखार आया

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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