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मुईन अहसन जज़्बी

1912 - 2005 | अलीगढ़, भारत

प्रमुखतम प्रगतिशील शायरों में विख्यात/ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के समकालीन/अपनी गज़ल ‘मरने की दुआएँ क्यों माँगूँ.......’ के लिए प्रसिद्ध, जिसे कई गायकों ने स्वर दिए हैं

प्रमुखतम प्रगतिशील शायरों में विख्यात/ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के समकालीन/अपनी गज़ल ‘मरने की दुआएँ क्यों माँगूँ.......’ के लिए प्रसिद्ध, जिसे कई गायकों ने स्वर दिए हैं

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मुख़्तसर ये है हमारी दास्तान-ए-ज़िंदगी

इक सुकून-ए-दिल की ख़ातिर उम्र भर तड़पा किए

यही ज़िंदगी मुसीबत यही ज़िंदगी मसर्रत

यही ज़िंदगी हक़ीक़त यही ज़िंदगी फ़साना

मौज-ए-बला उन को भी ज़रा दो चार थपेड़े हल्के से

कुछ लोग अभी तक साहिल से तूफ़ाँ का नज़ारा करते हैं

जो आग लगाई थी तुम ने उस को तो बुझाया अश्कों ने

जो अश्कों ने भड़काई है उस आग को ठंडा कौन करे

जब कश्ती साबित-ओ-सालिम थी साहिल की तमन्ना किस को थी

अब ऐसी शिकस्ता कश्ती पर साहिल की तमन्ना कौन करे

जब मोहब्बत का नाम सुनता हूँ

हाए कितना मलाल होता है

when mention of love is there

Aah! I feel such deep despair

जब तुझ को तमन्ना मेरी थी तब मुझ को तमन्ना तेरी थी

अब तुझ को तमन्ना ग़ैर की है तो तेरी तमन्ना कौन करे

मरने की दुआएँ क्यूँ माँगूँ जीने की तमन्ना कौन करे

ये दुनिया हो या वो दुनिया अब ख़्वाहिश-ए-दुनिया कौन करे

अल्लाह-रे बे-ख़ुदी कि चला जा रहा हूँ मैं

मंज़िल को देखता हुआ कुछ सोचता हुआ

मुस्कुरा कर डाल दी रुख़ पर नक़ाब

मिल गया जो कुछ कि मिलना था जवाब

मेरी अर्ज़-ए-शौक़ बे-मअ'नी है उन के वास्ते

उन की ख़ामोशी भी इक पैग़ाम है मेरे लिए

आए मौत ख़ुदाया तबाह-हाली में

ये नाम होगा ग़म-ए-रोज़गार सह सका

क्या मातम उन उम्मीदों का जो आते ही दिल में ख़ाक हुईं

क्या रोए फ़लक उन तारों पर दम भर जो चमक कर टूट गए

रिसते हुए ज़ख़्मों का हो कुछ और मुदावा

ये हर्फ़-ए-तसल्ली कोई मरहम तो नहीं है

उस ने इस तरह मोहब्बत की निगाहें डालीं

हम से दुनिया का कोई राज़ छुपाया गया

कभी दर्द की तमन्ना कभी कोशिश-ए-मुदावा

कभी बिजलियों की ख़्वाहिश कभी फ़िक्र-ए-आशियाना

तिरी रुस्वाई का है डर वर्ना

दिल के जज़्बात तो महदूद नहीं

हमीं हैं सोज़ हमीं साज़ हैं हमीं नग़्मा

ज़रा सँभल के सर-ए-बज़्म छेड़ना हम को

इक प्यास भरे दिल पर हुई तासीर तुम्हारी नज़रों की

इक मोम के बे-बस टुकड़े पर ये नाज़ुक ख़ंजर टूट गए

दिल-ए-नाकाम थक के बैठ गया

जब नज़र आई मंज़िल-ए-मक़्सूद

जब कभी किसी गुल पर इक ज़रा निखार आया

कम-निगाह ये समझे मौसम-ए-बहार आया

हज़ार बार किया अज़्म-ए-तर्क-ए-नज़्ज़ारा

हज़ार बार मगर देखना पड़ा मुझ को

ज़ब्त-ए-ग़म बे-सबब नहीं 'जज़्बी'

ख़लिश-ए-दिल बढ़ा रहा हूँ मैं

या अश्कों का रोना था मुझे या अक्सर रोता रहता हूँ

या एक भी गौहर पास था या लाखों गौहर टूट गए

हम दहर के इस वीराने में जो कुछ भी नज़ारा करते हैं

अश्कों की ज़बाँ में कहते हैं आहों में इशारा करते हैं

यूँ बढ़ी साअत-ब-साअत लज़्ज़त-ए-दर्द-ए-फ़िराक़

रफ़्ता रफ़्ता मैं ने ख़ुद को दुश्मन-ए-जाँ कर दिया

मेरी ही नज़र की मस्ती से सब शीशा-ओ-साग़र रक़्साँ थे

मेरी ही नज़र की गर्मी से सब शीशा-ओ-साग़र टूट गए

मिले मुझ को ग़म से फ़ुर्सत तो सुनाऊँ वो फ़साना

कि टपक पड़े नज़र से मय-ए-इशरत-ए-शबाना

तू और ग़म-ए-उल्फ़त 'जज़्बी' मुझ को तो यक़ीं आए कभी

जिस क़ल्ब पे टूटे हों पत्थर उस क़ल्ब में नश्तर टूट गए

अभी सुमूम ने मानी कहाँ नसीम से हार

अभी तो मअरका-हा-ए-चमन कुछ और भी हैं