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ग़ज़ल
अमीर ख़ुसरो
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
(ये मेरी एक ख़्वाहिश है जो मुश्किल है)
वो 'नज्म'-आफ़ंदि-ए-मरहूम को तो जानती होगी
जौन एलिया
ग़ज़ल
फ़िक्र-ए-नाला में गोया हल्क़ा हूँ ज़े-सर-ता-पा
उज़्व उज़्व जूँ ज़ंजीर यक-दिल-ए-सदा पाया
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
अमीर ख़ुसरो
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शेर
अमीर ख़ुसरो
उद्धरण
मेरा 'अक़ीदा है कि जो क़ौम अपने आप पर जी खोल कर हँस सकती है वो कभी ग़ुलाम नहीं हो सकती।...
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
ग़ज़ल
निगाहों को ख़िज़ाँ-ना-आश्ना बनना तो आ जाए
चमन जब तक चमन है जल्वा-सामानी नहीं जाती
जिगर मुरादाबादी
उद्धरण
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
ग़ज़ल
जब भी घर की छत पर जाएँ नाज़ दिखाने आ जाते हैं
कैसे कैसे लोग हमारे जी को जलाने आ जाते हैं
मुनीर नियाज़ी
उद्धरण
जिस आसमान पर कबूतर, शफ़क़, पतंग और सितारे न हों ऐसे आसमान की तरफ़ नज़र उठा कर देखने को जी नहीं चाहता।...
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
ग़ज़ल
'असद' जुज़ आब-ए-बख़्शीदन ज़े-दरिया ख़िज़्र को क्या था
डुबोता चश्मा-ए-हैवाँ में गर कश्ती सिकंदर की
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
हे की पर शक्ल हवासिल की सी आती है नज़र
नुक़्ता इस पर जो लगा ख़े हुआ ये वाह बे ख़े
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
हास्य
हज़ारों हादसे देखे ज़मानी भी मकानी भी
बहुत से रोग पाले हैं ज़े-राह-ए-क़द्रदानी भी












