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शेर
डाल कर ग़ुंचों की मुँदरी शाख़-ए-गुल के कान में
अब के होली में बनाना गुल को जोगन ऐ सबा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
नज़्म
नूर-जहाँ का मज़ार
ऐसी किसी जोगन की भी कुटिया नहीं होती
होती हो मगर यूँ सर-ए-सहरा नहीं होती
तिलोकचंद महरूम
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ग़ज़ल
कुछ भी नहीं होने की उलझन कुछ भी नहीं है तुम तो हो
ऐ मेरे दिल दश्त की जोगन कुछ भी नहीं है तुम तो हो
स्वप्निल तिवारी
ग़ज़ल
चलो दिखला ही दें अब क़ुव्वत-ए-बाज़ू के कुछ जौहर
ये अहल-ए-ज़ुल्म हम को नक़्श-ए-फ़र्यादी समझते हैं
कलीम क़ैसर बलरामपुरी
ग़ज़ल
मन मंदिर में ध्यान मगन है इक तेरा सच्चा साधू
और साधू के फेरे लेती जोगन गहरी ख़ामोशी
ख़्वाजा तारिक़ उस्मानी
ग़ज़ल
हुसना सरवर
नज़्म
प्रेम बिना मन सूना
प्रेम तू अपनी डगर बता जा
क्या तू जोगन बन बैठी
रुख़्साना निकहत लारी उम्म-ए-हानी
नज़्म
नुक़ूश-ए-माज़ी
ये कैफ़ियत थी और एक जोगन सितार बैठी बजा रही थी
मगर वो जंगल की शाहज़ादी बहार के गीत गा रही थी
जमील मज़हरी
ग़ज़ल
जिस्म-ओ-जाँ पर किसी जोगी का मैं साया देखूँ
इश्क़ की ताल पे जोगन का थिरकना देखूँ














