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ग़ज़ल
वो जो छुप जाते थे काबों में सनम-ख़ानों में
उन को ला ला के बिठाया गया दीवानों में
मख़दूम मुहिउद्दीन
ग़ज़ल
थोड़ा सा भी जिन लोगों को इरफ़ान-ए-मज़ाहिब था वो बच कर
का'बों से शिवालों से कलीसाओं से आगे निकल आए
क़तील शिफ़ाई
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ग़ज़ल
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
अहमद फ़राज़
शेर
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
अहमद फ़राज़
नज़्म
रम्ज़
तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे
मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं
जौन एलिया
नज़्म
शिकवा
बुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गए
है ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गए
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मुझ से पहले
एक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायद
अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा हो
अहमद फ़राज़
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
हो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर के
क्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर के
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
हज़ारों शेर मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में
अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता
बशीर बद्र
नज़्म
इतना मालूम है!
मुझ को पूछा था मुझे ढूँडा था चारों जानिब?
उस ने इक लम्हे को देखा मुझे और फिर हँस दी
परवीन शाकिर
ग़ज़ल
ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे
ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए
उबैदुल्लाह अलीम
नज़्म
एक आरज़ू
कानों पे हो न मेरे दैर ओ हरम का एहसाँ
रौज़न ही झोंपड़ी का मुझ को सहर-नुमा हो


