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नज़्म
इंतिज़ार
कागा के काएँ काएँ से दिल को तो आस भी हुई
पी जो कहा पपीहे ने दिल की मिरे ख़लिश बढ़ी
फ़ज़ल हक़ अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
किसी की आमद-ए-ख़ुश-कुन का मुज़्दा कौन देता है
बनेरे बोलता कागा न अब वो ख़ुश-ख़बर पंछी
अकरम कुंजाही
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
कहा मैं ने बात वो कोठे की मिरे दिल से साफ़ उतर गई
तो कहा कि जाने मिरी बला तुम्हें याद हो कि न याद हो
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
मुझे इश्तिहार सी लगती हैं ये मोहब्बतों की कहानियाँ
जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो
बशीर बद्र
ग़ज़ल
कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा





