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ग़ज़ल
हक़ीक़त-आश्नाई अस्ल में गुम-कर्दा राही है
उरूस-ए-आगही परवुर्दा-ए-इब्हाम है साक़ी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ईस्ट इंडिया कंपनी के फ़रज़ंदों से ख़िताब
देर से बैठे हो नख़्ल-ए-रास्ती की छाँव में
क्या ख़ुदा-ना-कर्दा कुछ मोच आ गई है पाँव में
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
न ग़ुबार-ए-रह-ए-मंज़िल है न आवाज़-ए-जरस
कौन मुझ रहरव-ए-गुम-कर्दा-निशाँ तक पहुँचे
हफ़ीज़ होशियारपुरी
ग़ज़ल
वो जो हुए फ़िरदौस-बदर तक़्सीर थी वो आदम की मगर
मेरा अज़ाब-ए-दर-बदरी मेरी ना-कर्दा-गुनाही है
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
गुम-कर्दा-ए-वफ़ूर-ए-ग़म-ए-इंतिज़ार हूँ
तू क्या छुपा कि मुझ को मुझी से छुपा दिया
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
कभी मैं आब के तामीर-कर्दा क़स्र में हूँ
कभी हवा में बनाए हुए से घर में था
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
फिर इक गुम-कर्दा-राह-ए-ज़िंदगी को मिल गई मंज़िल
सुजूद-ए-शुक्र-ए-बे-पायाँ अदा करने का वक़्त आया
शकील बदायूनी
नज़्म
तह-ए-नुजूम
कहीं ख़याल के आबाद-कर्दा गुलशन में
है एक गुल कि है ना-वाक़िफ़-ए-बहार अभी





