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नज़्म
शिकवा
उन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैं
सैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)
और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही ख़ुद-कुशी करेगी
जो शाख़-ए-नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ना-पाएदार होगा
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
क्यूँ मिरी ग़म-ख़्वार्गी का तुझ को आया था ख़याल
दुश्मनी अपनी थी मेरी दोस्त-दारी हाए हाए
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
फ़रमान-ए-ख़ुदा
तहज़ीब-ए-नवी कारगह-ए-शीशागराँ है
आदाब-ए-जुनूँ शाइर-ए-मशरिक़ को सिखा दो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
परछाइयाँ
बद-हाल घरों की बद-हाली बढ़ते बढ़ते जंजाल बनी
महँगाई बढ़ कर काल बनी सारी बस्ती कंगाल बनी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
आदमी-नामा
ये आदमी ही करते हैं सब कार-ए-दिल-पज़ीर
याँ आदमी मुरीद है और आदमी ही पीर
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
आख़िरी ख़त
शायद मिरी उल्फ़त को बहुत याद करोगी
अपने दिल-ए-मा'सूम को नाशाद करोगी





