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नज़्म
अंदेशा
चूड़ियों पर भी कई तंज़ किए जाएँगे
काँपते हाथों पे भी फ़िक़रे कसे जाएँगे
कफ़ील आज़र अमरोहवी
ग़ज़ल
बरस रही है हरीम-ए-हवस में दौलत-ए-हुस्न
गदा-ए-इश्क़ के कासे में इक नज़र भी नहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
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ग़ज़ल
तीन मोहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था
अच्छे-ख़ासे ऊँचे पूरे क़द-आवर थे बाबू जी
आलोक श्रीवास्तव
नज़्म
हिण्डोला
इसी ज़मीन पे घुटनों के बल चले होंगे
'मलिक-मोहम्मद' ओ 'रसखान' और 'तुलसी-दास'
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
न जाने क्या हो
काँपते हाथों पे फ़िक़रे भी कसे जाएँगे
लोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ता'ना देंगे
कफ़ील आज़र अमरोहवी
शेर
वो मजबूरी मौत है जिस में कासे को बुनियाद मिले
प्यास की शिद्दत जब बढ़ती है डर लगता है पानी से
मोहसिन असरार
ग़ज़ल
देख कर नज़म-ए-दो-आलम हमें कहना ही पड़ा
ये सलीक़ा है कसे अंजुमन-आराई का








