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ग़ज़ल
है फ़रोग़-ए-माह से हर मौज इक तस्वीर-ए-चाक
सैल से फ़र्श-ए-कताँ करते हैं ता-वीराना हम
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
इश्क़-ए-गुल में वही बुलबुल का फ़ुग़ाँ है कि जो था
परतव-ए-मह से वही हाल-ए-कताँ है कि जो था
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
इक़बाल अज़ीम
ग़ज़ल
ये इश्तियाक़-ए-शहादत में महव था दम-ए-क़त्ल
लगे हैं ज़ख़्म बदन पर कहाँ नहीं मा'लूम
हैदर अली आतिश
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ग़ज़ल
लाख पर्दे से रुख़-ए-अनवर अयाँ हो जाएगा
पर्दा खुल जाएगा हर पर्दा कताँ हो जाएगा
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
ग़ज़ल
कोई ढूँढता कताँ के तईं यारो पर है ग़म
मिलता कहीं नहीं दिल-ए-आगाह क्या करे
मिर्ज़ा जवाँ बख़्त जहाँदार
ग़ज़ल
मोजिज़-ए-शक़्क़ुल-क़मर दिखलाएगी अंगुश्त-ए-हुस्न
चाँद तेरे परतवे से ख़ुद कताँ हो जाएगा
क़द्र बिलग्रामी
ग़ज़ल
हम को कफ़न उसी का लाज़िम है माह-रू याँ
उल्फ़त का परतव-आसा हम ने कताँ में देखा





