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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
ख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूद
ख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूद
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
सब रक़ीबों से हों ना-ख़ुश पर ज़नान-ए-मिस्र से
है ज़ुलेख़ा ख़ुश कि महव-ए-माह-ए-कनआँ हो गईं
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
मुज़्तर ख़ैराबादी
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kaash
काश کاش
इच्छा आदि की सूचना के लिए प्रयुक्त शब्द, जैसे- 'यदि ऐसा करता या होता' का व्यंजक, 'ख़ुदा करता या करे' आदि
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ग़ज़ल
उस सितम-केश के चकमों में न आना 'बेख़ुद'
हाल-ए-दिल किस को सुनाते हो ये क्या करते हो
बेख़ुद देहलवी
नज़्म
कुछ दे इसे रुख़्सत कर
किस दीन का मुर्शिद है, किस केश का मोजिद है
किस शहर का शहना है किस देस का वाली है?
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
तू मिरे हाल से ग़ाफ़िल है पर ऐ ग़फ़लत-केश
तेरे अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल नहीं ग़फ़लत वाले
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
मैं वफ़ा-केश 'आरज़ू' और वो वफ़ा-ना-आश्ना
पड़ गया मुश्किल में पा कर अपनी मुश्किल का पता
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
पहुँच पाएँ न क्यूँ नज़रें कहीं मायूस चेहरों तक
'कुँवर' राहों में उन की केश घुँघराले पड़े होंगे
कुंवर बेचैन
ग़ज़ल
ख़ुदा करे कहे तुझ से ये कुछ ख़ुदा-लगती
कि ज़ुल्फ़ ऐ बुत-ए-बद-केश तेरे कान लगी
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
'सहबा' कौन शिकारी थे तुम वहशत-केश ग़ज़ालों के
मतवाली आँखों को तुम ने आख़िर कैसा राम किया
सहबा अख़्तर
ग़ज़ल
बज़्म में आमद हुई है किस तग़ाफ़ुल-केश की
तिश्नगी-ए-शौक़ के दिल को क़रार आ ही गया



