aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "khilaa.o"
ख़ुर्रम ख़िराम सिद्दीक़ी
शायर
अब्दुल खल्लाक़ शौकत
संपादक
ख़िदमत-ए-ख़लक़ आरगनाईज़ेशन, शोलापुर
पर्काशक
ख़िरद ग़ोशपुरी
खीमन यू. मूलानी
अनुवादक
खिल्ती कल्याँ शिक्षा समाज एवम कल्याण समितीbh, भोपाल
ख़िराम पब्लिकेशन्स, दिल्ली
आएशा तलअत खिलअत
लेखक
नासेह अहमद ख़िराम
born.2005
मुस्कुराओ बहार के दिन हैंगुल खिलाओ बहार के दिन हैं
साल में इक बार आता हैआते ही मुझ से कहता है''कैसे होअच्छे तो होलाओ इस बात पे केक खिलाओरात के खाने में क्या हैऔर कहो क्या चलता है''फिर इधर उधर की बातें करता रहता हैफिर घड़ी देख के कहता है''अच्छा तो मैं जाता हूँप्यारे अब मैंएक साल के ब'अद आऊँगाकेक बना के रखनासाथ में मछली भी खाऊंगा''और चला जाता है!उस से मिल करथोड़ी देर मज़ा आता है!लेकिन फिर मैं सोचता हूँख़ास मज़ा तो तब आएगाजब वो आ करमुझ को ढूँढता रह जाएगा!!
अच्छा हमें सिवय्याँ मिल-जुल के तुम खिलाओहम ने तुम्हारे पैसे इस ईद से बढ़ाएबच्चो तुम्हारी ईदी कैसे बढ़ाई जाए
नए गुलों को खिलाओ दिल-ए-ज़मीन पे तुमये दिल कबाब बनाने से कुछ नहीं होगा
खिलाओکِھلاؤ
feed
खिलाکِھلا
bloomed, blossomed
ख़िला'خِلاع
‘खिलअत' का बहु., खिलअते।
खिलाईکِھلائی
खाना, खुराक, खाने अथवा खिलाने की क्रिया या भाव, खाने या खिलाने का पारिश्रमिक, खाने या खिलाने का कार्य, बच्चों को खिलाने का काम, दाई को बच्चे खिलाने पर दिया जाने वाला पारिश्रमिक, वह दाई जो बच्चों को खेलाने के लिए नियुक्त की गई हो, धाय
Hawa ke Khilaaf
जहाँगीर नायाब
Chacha Abdul Baqi Aur Bhatije Bakhtiyar Khilji Ke Na Karname
मोहम्मद ख़ालिद अख़्तर
गद्य/नस्र
Khirad Afroz
हफ़ीज़ुद्दीन अहमद
दास्तान
Alauddin Khilji
परवेज़ अशरफ़ी
शख़्सियत
Iqbal Ke Tasawwurat-e-Ishq-o-Khirad
वज़ीर आग़ा
इक़बालियात तन्क़ीद
Aam fahm Tafseer
ख़्वाजा हसन निज़ामी
इस्लामियात
Tasavvurat-e-Ishq-Khirad Iqbal Ki Nazar Mein
वाक़ियात-ए-इसलाम का इंसाइकिलो-पीडिया
मोहम्मद हुसैन गौहर
विश्वकोश
Tasawwurat-e-Ishq-o-Khirad
Khilji Khaandaan
के. एस. लाल
Kaleela-o-Dimna
आयशा रईस कमाल
महिलाओं की रचनाएँ
Khirad Nama-e-Jalalpuri
अली अब्बास जलालपुरी
मिथक
Qadyaniyat
अबुल हसन अली नदवी
Kaleela-o-Dimna Par Lecture
सय्यद अली बिलग्रामी
व्याख्यान
दरवाज़ा घर का खड़काबाहर खड़ा था लड़काकहता था मैं हूँ भूकामुझ को खिलाओ खानाहोती है भूक क्या शयरोज़ा रखा तो जाना
ख़िज़ाँ में आग लगाओ बहार के दिन हैंनए शगूफ़े खिलाओ बहार के दिन हैं
वफ़ा के फूल खिलाओ बहार-ए-होली हैनज़र नज़र से मिलाओ बहार-ए-होली है
हर ग़म को भूल जाओ दिवाली की रात हैआओ दिए जलाओ दिवाली की रात हैहर दीप दे रहा है नई सुब्ह का पयामअब तुम भी मुस्कुराओ दिवाली की रात हैमैं ने भी कुछ चराग़-ए-मोहब्बत जलाए हैंबच्चो क़रीब आओ दिवाली की रात हैछोटे बड़ों का भेद न रक्खो दिलों में आजसब को क़रीब लाओ दिवाली की रात हैहँसता है ये दिवाली का इक इक चराग़ आजहोंटों पे गुल खिलाओ मिठाई उड़ाओ मौजऔर फुलझड़ी छुड़ाओ दिवाली की रात है
ज़माना हो गया छाया है गुलसिताँ पे जुमूदचमन-परस्तो नया गुल कोई खिलाओ तो
नन्हे नन्हे प्यारे प्यारेचम-चम टिम-टिम न्यारे न्यारेहल्के फुल्के नूर के धारेनील गगन के राज दुलारेजगमग जगमग जगमग तारेआ जाओ तुम घर जो हमारेतुम हो हमारे हम हों तुम्हारेआओ आओ छत पर आओआ न सको तो हाथ बढ़ाओदूध मलीदा खाओ खिलाओदिन में कहाँ छुपते हो बताओजगमग जगमग जगमग तारेआ जाओ तुम घर जो हमारेतुम हो हमारे हम हों तुम्हारेकोने में वो मेरी छड़ी हैऔर ये दस पैसे की घड़ी हैगेंद हमारी कितनी बड़ी हैखेलने को हर चीज़ पड़ी हैजगमग जगमग जगमग तारेआ जाओ तुम घर जो हमारेतुम हो हमारे हम हों तुम्हारेमैं हूँ पड़ा ख़ाक के घर मेंतुम हो बसे आकाश नगर मेंलाख हो दूरी बीच डगर मेंकुछ भी नहीं वो मेरी नज़र मेंजगमग जगमग जगमग तारेआ जाओ तुम घर जो हमारेतुम हो हमारे हम हों तुम्हारेरात में क्यों आते होदिन में कहाँ छुप जाते होअपने घर क्या क्या खाते होनूर कहाँ से पाते होजगमग जगमग जगमग तारेआ जाओ तुम घर जो हमारेतुम हो हमारे हम हों तुम्हारेतुम को होगी मा'लूमातमुझ को बता दो इतनी बातक्या है दिन और क्या है रातजाड़ा गर्मी और बरसातजगमग जगमग जगमग तारेआ जाओ तुम घर जो हमारेतुम हो हमारे हम हों तुम्हारे
नाल में गाँठ दे कर दाई ने कहापेड़े खिलाओ भई पेड़े खिलाओकान की लौ में सूई चुभो कर सुनार ने कहादो रुपये हुए दो रुपयेबाज़ू पर टीका लगा कर नर्स ने कहाबिल्कुल दर्द नहीं होगा बिल्कुलफुन्नू को नाप कर बब्लू ने कहातेरे से मेरा बड़ा है तेरे सेपीठ में घूँसा लगा कर बब्लू ने कहातेरे और मेरे बाप की कुश्ती हुई तोठोकर मार कर बब्लू ने कहारोती सूरत कहीं के रोती सूरत
ख़िज़ाँ नहीं है ब-जुज़ इक तरद्दुद-ए-बेजाचमन खिलाओ अगर ज़ौक़-ए-बाग़बानी है
ऐसे में तुम भी आ जाओदिल की बस्ती आ के बसाओमन के बासी फूल खिलाओबीता दुख का ज़माना प्यारे
फूल खिलाओ दामन के हर-सूख़ुशबू बिखेरो प्यार की हर-सूनन्हे-मुन्ने मासूम बच्चोआने वाले कल को सँवारो
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