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नज़्म
मुफ़्लिसी
ज़ंजीर ने किवाड़ न पत्थर गड़े रहे
आख़िर को ईंट ईंट खुदाती है मुफ़्लिसी
नज़ीर अकबराबादी
शेर
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
अल्लामा इक़बाल
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KHudaa.ii
ख़ुदाई خُدائی
ईश्वर-कृपा, ईश्वर-महिमा, दया-दृष्टि, विभूति, ईश्वरत्व, संसार, जगत्, दुनिया, सृष्टि, दुनिया, राज, हुक्मरानी
KHudaa.ii ho
ख़ुदाई हो خُدائی ہو
ईश्वर ही करे
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ग़ज़ल
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
आगे उस मुतकब्बिर के हम ख़ुदा ख़ुदा किया करते हैं
कब मौजूद ख़ुदा को वो मग़रूर-ए-ख़ुद-आरा जाने है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
निदा फ़ाज़ली
शेर
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है
किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
ख़ुद्दारी-ओ-महरूमी महरूमी-ओ-ख़ुद्दारी
अब दिल को ख़ुदा रक्खे अब दिल का ज़माना है
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
निसार मैं तेरी गलियों के
गर आज औज पे है ताला-ए-रक़ीब तो क्या
ये चार दिन की ख़ुदाई तो कोई बात नहीं





