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ग़ज़ल
रूप-सरूप की जोत जगाना उस नगरी में जोखम है
चारों खूँट बगूले बन कर घोर अंधेरे फिरते हैं
सय्यद आबिद अली आबिद
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विषय
ख़ून
ख़ून शायरी
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ग़ज़ल
दिल के गिर्द हिसार खिंचा तो उस का मिलना मुहाल हुआ
चारों खूँट आवारा फिरे जब पाँव भी अपने टूट गए
शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
शिकवा
जू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मा
मी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-मा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
ख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ाली
गुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लाली
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
तिश्ना-ए-ख़ूँ है अपना कितना 'मीर' भी नादाँ तल्ख़ी-कश
दम-दार आब-ए-तेग़ को उस के आब-ए-गवारा जाने है

