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नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मुझ से पहले
मैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा
खो चुका है जो किसी और की रानाई में
अहमद फ़राज़
नज़्म
कभी कभी
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं
ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले
साहिर लुधियानवी
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विषय
कूज़ा
कूज़ा शायरी
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शेर
ये कैसा नश्शा है मैं किस अजब ख़ुमार में हूँ
तू आ के जा भी चुका है मैं इंतिज़ार में हूँ
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
सुब्ह-ए-आज़ादी (अगस्त-47)
सुना है हो भी चुका है फ़िराक़-ए-ज़ुल्मत-ओ-नूर
सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
इतना मालूम है!
मैं यहाँ हूँ मगर उस कूचा-ए-रंग-ओ-बू में
रोज़ की तरह से वो आज भी आया होगा
परवीन शाकिर
ग़ज़ल
मुश्किल हैं अगर हालात वहाँ दिल बेच आएँ जाँ दे आएँ
दिल वालो कूचा-ए-जानाँ में क्या ऐसे भी हालात नहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
मैं था मफ़्हूम ना-मफ़्हूम में गुम हो चुका हूँ मैं
मैं था मालूम ना-मालूम में गुम हो चुका हूँ मैं
जौन एलिया
नज़्म
ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में
न पूछ इस का कि वो दिवाना
बहुत दिनों का उजड़ चुका है
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
मिरे चारा-गर को नवेद हो सफ़-ए-दुश्मनाँ को ख़बर करो
जो वो क़र्ज़ रखते थे जान पर वो हिसाब आज चुका दिया




