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नज़्म
किसी को उदास देख कर
ये शाह-राहों पे रंगीन साड़ियों की झलक
ये झोंपड़ों में ग़रीबों के बे-कफ़न लाशे
साहिर लुधियानवी
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विषय
क़ातिल
क़ातिल शायरी
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नज़्म
ख़ाक-ए-हिंद
कुछ कम नहीं अजल से ख़्वाब-ए-गिराँ हमारा
इक लाश-ए-बे-कफ़न है हिन्दोस्तान हमारा
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
किसी ज़रदार से जिंस-ए-तबस्सुम माँगने वाले
किसी बेकस के लाशे पर शरीक-ए-चश्म-ए-नम हो जा
साग़र सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
नाज़ मअशूक़ाना से ख़ाली नहीं है कोई बात
मेरे लाशे को उठाए हैं वो किस अंदाज़ से
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ग़ज़ल
कहा अहल-ए-हरम ने रोके यूँ अकबर के लाशे पर
जवाँ होने का शायद तुम ने रक्खा नाम मर जाना
महाराजा सर किशन परसाद शाद
नज़्म
जनाज़े में तो आओगे न मेरे
मगर लाशे पे तो आँसू बहाओगे न मेरे?
वो हँस देते हैं मेरी बात पर

