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नज़्म
छछूंदर
तख़्त पर लेटें तो आ जाता है दस्त
इस लिए सब लोग ढीली चारपाई पर हैं मस्त
मोहम्मद यूसुफ़ पापा
शेर
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
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dege.n
देगें دیگیں
देग़ का बहुवचन, बहुत सी देगें, छोटे मुँह और बड़े पेट का एक ताँबे का बर्तन जिसमें चावल आदि पकाये जाते हैं
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ग़ज़ल
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
वालिद की वफ़ात पर
कहीं कुछ भी नहीं बदला
तुम्हारे हाथ मेरी उँगलियों में साँस लेते हैं
निदा फ़ाज़ली
नज़्म
लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
रूह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ढाका से वापसी पर
दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बा'द
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
दिलबरी ठहरा ज़बान-ए-ख़ल्क़ खुलवाने का नाम
अब नहीं लेते परी-रू ज़ुल्फ़ बिखराने का नाम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
तबीअत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
हम ऐसे में तिरी यादों की चादर तान लेते हैं
