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नज़्म
मुहासरा
सो शर्त ये है जो जाँ की अमान चाहते हो
तो अपने लौह-ओ-क़लम क़त्ल-गाह में रख दो
अहमद फ़राज़
नज़्म
किसान
ख़ून जिस का दौड़ता है नब्ज़-ए-इस्तिक़्लाल में
लोच भर देता है जो शहज़ादियों की चाल में
जोश मलीहाबादी
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ग़ज़ल
हज़ार शाख़ें अदा से लचकीं हुआ न तेरा सा लोच पैदा
शफ़क़ ने कितने ही रंग बदले मिला न रंग-ए-शबाब तेरा
जोश मलीहाबादी
नज़्म
क्या गुल-बदनी है
वो चाल में है लोच कि शाख़ें हैं पशेमाँ
और लाल-ए-गुहर-बार पे वो नग़्मा है ग़लताँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
हुस्न और मज़दूरी
धूप में लहरा रही है काकुल-ए-अम्बर-सरिश्त
हो रहा है कम-सिनी का लोच जुज़्व-ए-संग-ओ-ख़िश्त
जोश मलीहाबादी
नज़्म
औरत
लर्ज़िश-ए-सीमाब बिजली की तड़प शाख़ों का लोच
अक़्ल की तेज़ी तबीअत की उपच शाइ'र का सोच
शाद आरफ़ी
नज़्म
तवाइफ़
तेरी हो शोख़ी लचर है तेरा हर अंदाज़ पोच
सख़्त-तर है संग-ओ-आहन से तिरी बाहोँ का लोच
माहिर-उल क़ादरी
नज़्म
तवहहुम
उन के लहजे में वो कुछ लोच वो झंकार वो रस
एक बे-क़स्द तरन्नुम के सिवा कुछ भी न था

