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ग़ज़ल
हर दम तड़प के लोटता फिरता हूँ ख़ाक पर
गोया बना हूँ ताइर-ए-बिस्मिल तिरे बग़ैर
नादिर शाहजहाँ पुरी
नज़्म
गुमाँ का मुमकिन- जो तू है मैं हूँ
दूर रेग ओ हवा की यादों में लोटता है)
जो बहते पानी को अपनी दरिया-दिली की
नून मीम राशिद
कुल्लियात
यकसाँ है क़त्ल-गह और उस की गली तो मुझ को
वाँ ख़ाक में मैं लोटा याँ लोहू में नहाया
मीर तक़ी मीर
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ग़ज़ल
लोटता था इस में बद-ख़़ूई से मैं मानिंद-ए-अश्क
शोख़ी-ए-तिफ़्लान से जुम्बाँ मिरा गहवारा था
हैदर अली आतिश
हास्य
ख़ुदी का जाम रास आता नहीं हाथों में लोटा है
मिरे शौहर का क़द 'इक़बाल' से थोड़ा ही छोटा है
खालिद इरफ़ान
ग़ज़ल
पुकारा दूर से दे कर सफ़ीर उस ने तो क्या मेरा
धड़क कर यक-ब-यक सीने में दिल लोटा कबूतर सा
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
अभी भूक से एक चूहा मरा है
न कपड़ा न रोटी न लोटा न धोती
परेशाँ है पोता बिलकती है पोती
मोहम्मद यूसुफ़ पापा
ग़ज़ल
लोटता है 'जुरअत'-ए-बेताब जाने से तिरे
यूँ उसे तड़पा के तू ऐ शोख़-ए-बे-परवा, न जा
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
जिधर के हो उधर के हो रहो दिल से तो बेहतर है
कि लोटा बे-तली का हो तो टोंटी टूट जाती है
मन्नान बिजनोरी
ग़ज़ल
हाथ आ गया है जब से शुऊ'र-ए-ख़ुदी का साँप
सीने पे लोटता है ग़म-ए-ज़िंदगी का साँप
करामत अली करामत
ग़ज़ल
ये मतलब है कि मुज़्तर ही रहूँ मैं बज़्म-ए-क़ातिल में
तड़पता लोटता दाख़िल हुआ आदाब-ए-महफ़िल में





