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ग़ज़ल
इसी मिट्टी का ग़म्ज़ा हैं मआरिफ़ सब हक़ाएक़ सब
जो तुम चाहो तो इस जुमले को लौह-ए-ज़र पे लिख देना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
और खिल जा कि मआ'रिफ़ की गुज़रगाहों में
पेच ऐ ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम अभी बाक़ी हैं
सिराजुद्दीन ज़फ़र
नज़्म
इंसान की फ़रियाद
हाँ ऐ मसाफ़-ए-हस्ती! मत पूछ मुझ से क्या हूँ
इक अर्सा-ए-बला हूँ इक लुक़मा-ए-फ़ना हूँ
ग़ुलाम भीक नैरंग
ग़ज़ल
और खुल जा कि मआ'रिफ़ की गुज़रगाहों में
पेच ऐ ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम अभी बाक़ी हैं
सिराजुद्दीन ज़फ़र
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manaarii
मनारी مَناری
منار (رک) سے منسوب یا متعلق ، منار کا ، مینار پر لکھا ہوا ، مینار پر نقش کیا ہوا ، دیواری ۔
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नज़्म
मैं पल दो पल का शा'इर हूँ
कल कोई मुझ को याद करे क्यूँ कोई मुझ को याद करे
मसरूफ़ ज़माना मेरे लिए क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
मसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा कर
शबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जा
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मैं सारा दिन बहुत मसरूफ़ रहता हूँ मगर जूँही
क़दम चौखट पे रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं










