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नज़्म
बंजारा-नामा
क्या बधिया भैंसा बैल शुतुर क्या गौनें पल्ला सर-भारा
क्या गेहूँ चाँवल मोठ मटर क्या आग धुआँ और अँगारा
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
फ़रहान सालिम
हास्य
क्या क्या नहीं था अपनी तवाज़ो' में उन के घर
छोले मटर वो आलू-बुख़ारा कि हाए हाए
मसरूर शाहजहाँपुरी
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नज़्म
रज़िया-सुल्ताना कोरंगी, ''के'' एरिया
कि अब उस के अपने दुपट्टे क़मीस और शलवार चप्पल के जोड़े
नमक मिर्च आलू मटर प्याज़ लहसन चुक़ंदर टमाटर
हारिस ख़लीक़
नज़्म
हम को देखे जो आँख वाला हो
सख़्त सूखी हुई मटर की तरह
किसी माशूक़ की कमर की तरह
मोहम्मद यूसुफ़ पापा
बच्चों की कहानी
नसर मलिक
ग़ज़ल
तक़दीर ही कुछ अपनी मटर-गश्त किए है
'तमजीद' ये मुमकिन है महालात बता दूँ
सय्यद तम्जीद हैदर तम्जीद
नज़्म
आज की ताज़ा ख़बर
मर गया भूक में ये खा के कहीं कच्ची मटर
आज की ताज़ा ख़बर आज की ताज़ा ख़बर आज की ताज़ा ख़बर
सरपट लखनवी
नज़्म
प्यारी प्यारी सब्ज़ियाँ
मोतियों से हैं मटर सालन बनाओ
क्या मज़े का होता है इस का पुलाव
यासिर फ़ारूक़
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
भली सी एक शक्ल थी
न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे
मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे


