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नज़्म
कार्ल मार्क्स
माद्दी तारीख़-ए-आलम जिस की तालीफ़-ए-अज़ीम
तास कैपिटाल है या ज़ीस्त का लुब्ब-ए-लुबाब
वामिक़ जौनपुरी
नज़्म
हम को देखे जो आँख वाला हो
माद्दी इल्म का जबल हैं हम
हाँ मियाँ इनटेलेकचुअल हैं हम
मोहम्मद यूसुफ़ पापा
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उद्धरण
सय्यद सिब्ते हसन
नज़्म
इदराक
मिरी निगाह ख़ुराफ़ात-ए-माद्दी पे नहीं
ख़िरद है पस्त हक़ीक़त है अरफ़ा'उद्दरजात
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
ग़ज़ल
अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़'
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइ'ज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
ख़ूब-सूरत मोड़
मिरे हमराह भी रुस्वाइयाँ हैं मेरे माज़ी की
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साए हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
रक़ीब से!
आजिज़ी सीखी ग़रीबों की हिमायत सीखी
यास-ओ-हिरमान के दुख-दर्द के मअ'नी सीखे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
शिकवा
महफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरे
मय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरे











