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नज़्म
शिकवा
क़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरती
बुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करती
अल्लामा इक़बाल
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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
सो हम भी इस नफ़स तक हैं सिपाही एक लश्कर के
हज़ारों साल से जीते चले आए हैं मर मर के
जौन एलिया
नज़्म
ला-इलाहा-इल्लल्लाह
ये माल-ओ-दौलत-ए-दुनिया ये रिश्ता ओ पैवंद
बुतान-ए-वहम-ओ-गुमाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाह
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
न बरतो उन से अपनायत के तुम बरताव ऐ 'मुज़्तर'
पराया माल इन बातों से अपना हो नहीं सकता
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
क़ल्ब ओ निगाह की ये ईद उफ़ ये मआल-ए-क़ुर्ब-ओ-दीद
चर्ख़ की गर्दिशें तुझे मुझ से छुपा के रह गईं
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
आदमी-नामा
चलता है आदमी ही मुसाफ़िर हो ले के माल
और आदमी ही मारे है फाँसी गले में डाल









