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नज़्म
बदनाम हो रहा हूँ
बस्ती की लड़कियों में अफ़्साना बिन गया हूँ
हर माह-वश के लब का पैमाना बन गया हूँ
अख़्तर शीरानी
नज़्म
'ग़ालिब' का पोस्टमार्टम
कोई भी महवश अकेले में अगर आ जाए हाथ
छेड़ख़्वानी कर दिया करता था अक्सर उस के साथ
नश्तर अमरोहवी
ग़ज़ल
बुतान-ए-माह-वश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं
कि जिस की जान जाती है उसी के दिल में रहते हैं
दाग़ देहलवी
नज़्म
नन्हा क़ासिद
उसे क्या इल्म इन रंगीं लिफ़ाफ़ों में छुपा क्या है
किसी महवश का इन के भेजने से मुद्दआ क्या है
अख़्तर शीरानी
ग़ज़ल
ये अजीब साक़ी-ए-माह-वश तिरे मय-कदे का निज़ाम है
हुआ जैसे तू भी दिवालिया न तो ख़ुम न मय है न जाम है
शौक़ बहराइची
ग़ज़ल
किसी महवश के ग़म ने कर दिया ना-ताक़त ऐसा ही
कि छुटते देखते हैं अक्सर आँखों आगे तारे हम










