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ग़ज़ल
कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ कब तक रह दिखलाओगे
कब तक चैन की मोहलत दोगे कब तक याद न आओगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
मरसिए
कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ कब तक रह दिखलाओगे
कब तक चैन की मोहलत दोगे कब तक याद न आओगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मर्ग-ए-सोज़-ए-मोहब्बत
आओ कि मर्ग-ए-सोज़-ए-मोहब्बत मनाएँ हम
आओ कि हुस्न-ए-माह से दिल को जलाएँ हम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
रूठता हूँ जो कभी मैं तो ये कहता है वो शोख़
क्या ग़रज़ हम को पड़ी है जो मनाएँ तुझ को








