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शेर
जब आ जाती है दुनिया घूम फिर कर अपने मरकज़ पर
तो वापस लौट कर गुज़रे ज़माने क्यूँ नहीं आते
इबरत मछलीशहरी
शेर
अपने मरकज़ की तरफ़ माइल-ए-परवाज़ था हुस्न
भूलता ही नहीं आलम तिरी अंगड़ाई का
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
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ग़ज़ल
शकील बदायूनी
नज़्म
जवाहर-लाल नेहरू
दामन-ए-वक़्त पे अब ख़ून के छींटे न पड़ें
एक मरकज़ की तरफ़ दैर-ओ-हरम ले के चलो
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
मर्कज़-ए-दीदा-ए-ख़ुबान-ए-जहाँ हैं भी तो क्या
एक निस्बत भी तो रखते हैं तिरी ज़ात से हम







