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ग़ज़ल
मोहब्बत है रमी शक पर मोहब्बत तौफ़-ए-महबूबी
सफ़ा मर्वा ने समझाया मोहब्बत हज्ज-ए-अकबर है
शहज़ाद क़ैस
नज़्म
नए सुर की तमसील
जिस में रागों का जौहर बँधा है
कहीं एेमनी रस कहीं मारवा ठाठ भाग्यश्री
अख़्तर उस्मान
ग़ज़ल
ख़ुबाँ के बाग़ में रौनक़ हुए तो किस तरह याराँ
न दोना है न मरवा है न सौसन है न लाला है
पंडित चंद्र भान ब्रह्मण
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marvaa
मरवा مَروا
(संग-तराशी) बड़े-बड़े पत्थर का बना हुआ मेहराबदार फाटकों के किवाड़ की चूल का घर (भेद), बना हुआ पत्थर का तोड़ा अर्थात वो पत्थर का तोड़ा जिसमें फाटक के किवाड़ की चूल बनी हो
marnaa
मरना مَرنا
जीव-जंतुओं या प्राणियों के शरीर में से जीवनी शक्ति या प्राण का सदा के लिए निकल जाना जिसके फलस्वरूप उनकी सभी शारीरिक क्रियाएँ या व्यापार बन्द हो जाते हैं। आय या जीवन का अंत या समाप्त होना। मृत्यु को प्राप्त होना। जान निकलना। जैसे-महामारी से (या युद्ध में) लोगों का मरना। पद-मरना-जीना। (देखें स्वतंत्र पद) मुहा०-मरने तक की छुट्टी (या फुरसत) न होना = काय की अधिकता के कारण तनिक भी अवकाश न होना। नाम को भी साँस लेने या सुस्ताने का समय न मिलना।
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ग़ज़ल
शामिल हैं सदा स'य-ए-‘अमल में सफ़ा मर्वा
का'बे की ज़मीं अस्ल में फ़िरदौस-ए-बरीं है
इरतिज़ा निशात
नज़्म
रम्ज़
इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर
इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन
जौन एलिया
ग़ज़ल
कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
क्या क्या फ़ित्ने सर पर उस के लाता है माशूक़ अपना
जिस बे-दिल बे-ताब-ओ-तवाँ को इश्क़ का मारा जाने है
मीर तक़ी मीर
नज़्म
आवारा
ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ



